Criminal Cases Against MPs-MLAs: सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों को तेजी से निपटाने की मांग वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई.
कोर्ट में दाखिल इस रिपोर्ट के मामले में एमिकस क्यूरी वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने जानकारी दी कि देश में 51 सांसदों और 71 विधायकों के ऊपर मनी लॉन्ड्रिंग के केस हैं. 151 संगीन मामले विशेष अदालतों में हैं, इनमें से 58 उम्र कैद की सज़ा वाले मामले हैं, लेकिन अधिकतर मामले कई सालों से लंबित हैं. कई राज्यों में सरकार बिना उचित कारण बताए जनप्रतिनिधियों के मुकदमे वापस ले रही है. यूपी सरकार ने भी मुजफ्फरनगर दंगों के 77 मुकदमे वापस लेने का आदेश जारी किया है.
इसपर चीफ जस्टिस (CJI) एनवी रमणा ने कहा कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों में 10 से 15 साल के लिए आरोपपत्र दाखिल ना करने का कोई कारण नहीं है. उन्होंने कहा कि सिर्फ प्रॉपर्टी अटैच करने से कुछ नहीं होगा, जांच लंबित रखने का कोई कारण नहीं है. हां, अगर कोई केस दुर्भावना से दर्ज हुआ है, तो राज्य सरकार उसे वापस ले सकती है. लेकिन उसे आदेश जारी करते समय कारण बताना चाहिए. राज्य सरकार के ऐसे आदेश की हाई कोर्ट में न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए. इसके बाद ही मुकदमा वापस हो सकता है.
सुनवाई के अंत में याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय के लिए पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने मांग करते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में सज़ा पाने वाले लोगों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगे. इस पर सीजेआई ने कहा, “आजीवन प्रतिबंध एक ऐसी चीज है जिस पर संसद को गौर करना चाहिए, अदालत को नहीं.”
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