What is FPO-IPO? : हिंडनबर्ग रिसर्च (Hindenburg Research) की रिपोर्ट के बाद अडानी ग्रुप ने अपने फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO) को रद्द किया, तब कई लोग ऐसे थे जिन्होंने पहली बार इस टर्म का नाम सुना. क्या आप जानते हैं कि FPO होता क्या है और कोई कंपनी इसे क्यों लेकर आती है? साथ ही, FPO और इनीशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) में फर्क क्या है? आइए आज इसी को समझते हैं-
कंपनियां अपने कारोबार को फैलाने के लिए IPO और FPO का इस्तेमाल करती हैं. कोई कंपनी जब पहली बार मार्केट में अपने शेयर उतारती है, तो वह IPO लेकर आती है. लेकिन एक बार लिस्ट होने के बाद अगर उसे दोबारा शेयर जारी करने हों, तो उस स्थिति में कंपनी FPO लेकर आती है.
यानी स्टॉक मार्केट में पहली बार एंट्री कर रही कंपनी IPO निकालती है जबकि स्टॉक मार्केट में लिस्टेड कंपनी FPO लेकर आती है. नए शेयर जारी करने से कंपनी को कैपिटल मिलता है और उसका इस्तेमाल वह अपनी जरूरत पर करती है. आमतौर पर FPO से कंपनियां अपने कर्ज भी निपटाती हैं.
FPO दो तरह के होते हैं... पहला डिल्यूटिव FPO (Dilutive FPO) और दूसरा नॉन-डिल्यूटिव FPO (Non Dilutive FPO).
डिल्यूटिव FPO में कंपनी एक्सट्रा शेयर जारी करती है, इससे EPS पर असर होता है. इसे ऐसे समझिए कि कंपनी के कुल शेयरों की कीमत में नए शेयर और जुड़ जाएं.
ऐसे में नए शेयर कुछ अतिरिक्त रकम नहीं बढ़ाते हैं बल्कि पहले से मौजूद शेयरों की वैल्यू को कम करके अपनी वैल्यू बनाते हैं. कंपनी की कमाई इन नए शेयरों की बिक्री से तो होती है लेकिन EPS इससे कम हो जाता है. इससे शेयरधारक के पास शेयर की संख्या तो बढ़ती है लेकिन उनकी वैल्यू घट जाती है.
Non डिल्यूटिव FPO में कंपनी खुद नए शेयर जारी नहीं करती बल्कि कंपनी के Promotor अपने शेयर बेचते हैं. इससे इक्विटी डिल्यूशन नहीं होता है. इससे EPS पर भी कोई असर नहीं होता है.
EPS का फुल फॉर्म Earnings per share है. EPS एक मीट्रिक है जिसका इस्तेमाल किसी कंपनी की profitability का पता लगाने के लिए होता है. EPS बताता है कि कोई कंपनी अपने एक शेयर के लिए कितनी कमाई कर सकती है.
FPO कोई लिस्टेड पब्लिक कंपनी तभी जारी करती है, जब उसे भविष्य की किसी योजना को पूरा करने के लिए रकम की जरूरत होती है.कंपनियां FPO से मिले धन को कर्ज कम करने और शेयर की लिक्विडिटी बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल करती हैं.
IPO में शेयरों की बिक्री के लिए फिक्स्ड प्राइस होता है. इसे प्राइस बैंड कहते हैं. कंपनी शेयर का प्राइस बैंड, लीड बैंकर्स फिक्स करते हैं. लेकिन FPO के वक्त शेयरों का प्राइस बैंड, मार्केट में पहले से मौजूद शेयरों की कीमत से कम रखा जाता है.
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