Mehmood Ali: बॉलीवुड में कई ऐसे कलाकार हुए जो एक्टिंग के साथ ही साथ अपने खास अंदाज और व्यवहार के लिए याद किए जाते हैं, इस फेहरिस्त में एक नाम महमूद अली (Mehmood Ali) का भी आता है. वो अपने ज़माने के मशहूर अभिनेता थे, जिन्हें किंग ऑफ़ कॉमेडी का ख़िताब दिया गया. 50 से 70 के दशक में जब हिंदी सिनेमा में कॉमेडियन के रोल का काफी अधिक स्कोप नहीं था, ऐसे समय में महमूद एकलौते ऐसे कॉमेडियन (Comedian) थे जिनकी तस्वीर लीड रोल कर रहे एक्टर के साथ सिनेमाघरों के बाहर पोस्टर पर छपती थी.
कहते हैं कि उस वक़्त महमूद बहुत बड़ा नाम था. वो एक ऐसे एक्टर थे, जो दर्शकों को अपनी एक्टिंग से खूब हंसाते थे और खूब रुलाते भी थे. उनके डायलॉग सुनकर अच्छे से अच्छे अभिनेता के भी पसीने छूट जाते थे. वो जब भी फिल्म का कोई शॉट देते, किसी को पता नहीं रहता था कि वो अब क्या बोल देंगे और कैसे करेंगे.
कहा तो ये भी जाता है कि उस वक़्त महमूद को हीरो से ज़्यादा पैसे मिला करते थे. यह बात कई हीरो को पसंद नहीं थी. इसलिए वो यही कोशिश करते थे कि उनकी फिल्मों में निर्देशक और निर्माता महमूद को न लें. मगर ऐसा बहुत कम हुआ. क्यों कि डायरेक्टर जानते थे कि महमूद फिल्म को हिट कराने के किसी फॉर्मुले से कम नहीं थे.
इंडस्ट्री में सब जानते थे कि महमूद अली अपने समय के बेहद पाबंद थे. वह सेट पर समय से पहुंचते थे और दूसरे कलाकारों से भी यही उम्मीद करते थे. एक बार उनकी फिल्म जनता दरबार में बॉलीवुड के मशहूर एक्टर राजेश खन्ना को काम मिला था. यह वह दौर था जब राजेश खन्ना को हिंदी सिनेमा में सुपरस्टार के तौर जाना जाने लगा था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजेश खन्ना का स्टारडम इस कदर था कि लड़कियां उनकी गाड़ी की धूल से अपनी मांग तक भरती थीं.
राजेश को सेट पर देर से पहुंचने की आदत थी. कहा जाता था कि अगर उन्हें सुबह का वक्त दिया जाता था तो वह सेट पर शाम को पहुंचा करते थे. उनकी इस आदत के कारण बॉलीवुड के मशहूर एक्टर महमूद काफी नाराज हो गए थे और उन्होंने राजेश खन्ना को थप्पड़ तक मार दिया था.
महमूद वक्त के पाबंद होने के साथा साथ काफी दरियादिली इंसान भी थे. इसके पीछे एक वजह यह भी था कि वह बेहद गरीब परिवार से आते थे. महमूद के आठ भाई बहन थे जिसमें से बहन मीनू मुमताज बड़ी अभिनेत्री थीं. बचपन में घर की आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए महमूद, मलाड और विरार के बीच चलने वाली लोकल ट्रेनों में टॉफियां बेचा करते थे. महमूद ने अंडे बेचने और टैक्सी चलाने जैसे काम भी किए.
महमूद के पिता मुमताज अली बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में काम किया करते थे.अपने पिता के कहने पर साल 1943 में उन्हें पहली बार बॉम्बे टॉकीज की फिल्म 'किस्मत' में किस्मत आजमाने का मौका मिला था.अपने अभिनय के दम पर महमूद ने करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बना लिया. . इसके बाद महमूद आगे बढ़ते रहे और कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.
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