एक दौर था जब गुजरात की सत्ता पर कांग्रेस (Congress) का दबदबा रहा करता था. लेकिन 1995 के बाद से ही कांग्रेस गुजरात में पिछड़ती चली गई. पार्टी 1995 के बाद से गुजरात में लगातार 6 विधानसभा चुनाव हार चुकी है, हालांकि उसे इस बार सत्ता वापसी की उम्मीद है और ऐसा इसलिए क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी (BJP) को कड़ी टक्कर दी थी. कांग्रेस को 77 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि बीजेपी 99 सीट जीतकर सत्ता बचाने में कामयाब रही थी.
कांग्रेस को मजबूती देता है ये फैक्टर !
दरअसल कांग्रेस पिछले 6 विधानसभा चुनाव में लगातार हारी जरूर है, लेकिन उसकी ताकत ये रही कि उसने 40 फीसदी वोट बैंक पर अपनी पकड़ लगातार बनाए रखी और अगर इस चुनाव में कांग्रेस 'खम' यानि (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) के वोट लेने में कामयाब हो जाती है, तो वो बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकती है...लिहाजा इस बार भी पार्टी को अपने पारंपरिक वोटर्स (Congress traditional voters) के समर्थन की उम्मीद कर रही है. कांग्रेस को उम्मीद है कि कोली और ठाकोर (koli and thakor voters) जैसे ओबीसी समुदाय, मुस्लिम, अनुसूचित जातियां और जनजातियां उसे समर्थन करेंगी. गौरतलब है कि कांग्रेस कभी KHAM फॉर्मूला के बल न सिर्फ जीतती रही बल्कि जीत का ऐसा रिकॉर्ड बनाया है जो अभी तक नहीं टूटा.
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की कमजोरी
सूबे में कांग्रेस की कमियों पर अगर नजर डालें, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है राज्य स्तर पर मजबूत नेताओं की कमी . साथ ही पार्टी की राज्य इकाई की गुटबाजी भी किसी से छुपी नहीं है. कांग्रेस लंबे वक्त से अंदरूनी कलह (congress infighting) से जूझ रही है. वहीं सियासी जानकर मानकर चल रहे हैं कि चुनाव के वक्त पार्टी के सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी 'भारत जोड़ो यात्रा' (Bharat Jodo Yatra) में व्यस्त हैं और गुजरात इकाई को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है. ऐसे में पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी भी दिखती है. जो चुनाव में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकती है. इसके अलावा पार्टी के कई बड़े नेता भी भगवा रंग में रंग चुके हैं.
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चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति
बहुत से लोग ये देखकर हैरान हैं, कि राहुल गांधी (Rahul gadhi) इस बार गुजरात में एक्टिव क्यों नहीं हैं, लेकिन सियासी जानकार मानकर चल रहे हैं कि ये कांग्रेस की रणनीति का एक अहम हिस्सा है. पिछले चुनावों में देखा गया है कि मुकाबला मोदी वर्सेस राहुल (Modi Vs Rahul) होता रहा है और मोदी (Modi) की मजबूत छवि में राहुल कहीं ना कहीं दब जाते हैं. इसीलिए इस बार कांग्रेस ने रणनीति बदलते हुए पड़ोसी राज्य राजस्थान मॉडल को सामने रखकर चुनाव प्रचार की कमान राजस्थान के सीएम और अनुभवी नेता अशोक गहलोत को सौंपी. वहीं कांग्रेस आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में छोटी-छोटी सभाएं कर रही है. इन सभाओं में बीजेपी की महंगी रैलियों का जिक्र किया जा रहा है. बिलकिस बानो, मोरबी पुल हादसा और महंगाई जैसे मुद्दों को उठाया जा रहा है. दरअसल कांग्रेस इन आदिवासी इलाकों की करीब 27 रिजर्व सीटों पर बीजेपी से हमेशा आगे रही है और उसे इस बार ज्यादा बढ़त की उम्मीद है. कांग्रेस ये भी मानकर चल रही है कि आम आदमी पार्टी के आने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है, जिसका फायदा उसे मिल सकता है.
कांग्रेस के सामने ये बड़ी चुनौती
कांग्रेस की पकड़ ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में रही है, वहीं बीजेपी शहरी इलाकों में मजबूत है. यही वजह है कि कांग्रेस के लिए चुनाव में शहरी मतदाताओं को साथ लाना एक बार फिर बड़ी चुनौती है. ऐसी करीब 66 प्रतिशत शहरी विधानसभा सीटें हैं, जिन्हें कांग्रेस पिछले 30 सालों से नहीं जीत सकी है और यही सीटें बीजेपी को हर बार मजबूती देती हैं.
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